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कृष्ण: तु भगवान

 ऋग्वेद मंत्र के अनुसार आर्यों ने अगस्त्य वशिष्ठ आदि ऋषियों से जब संपर्क किया तब तक एक सभ्यता वैदिक युग की जिसमें भगवान राम भगवान कृष्ण एवं इन्द्र अश्विनी कुमार आदि के युग की समाप्ति हो चुकी थी और कृष्ण का सगुण पूजन ऋषि धर्म के अनुसार चालू था ! आर्यों ने भी हवि द्वारा यज्ञ रूप से पूजन शुरू किया किन्तु गहराई में पहुंच कर उस ब्रह्म का ज्ञान कस्मै देवाय हविषा विधेम की शंका रही ! ऋषियों के वेद मतानुसार विष्णोर्यत् परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय: को स्थापित करते हुए हमें सब ग्रंथों का प्रसाद  वर्तमान के ऋषियों व्यास एवं बाल्मीकि जो दैवी युग के बाद हुए, तेषां आदित्यवत् ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम् भगवद्गीता रूप में प्राप्त हुआ फिर अजायमानो बहुधा विजायते रूपी  तत् आत्मानम् सृजामि का ज्ञान मिला ! बाद में वेदांग/वेदांत पुराणों संहिताओं शास्त्रों आदि की रचना हुई ! यह समस्त ग्रंथ पुराने समय की सभ्यता और इतिहास पर लिखे गये क्योंकि वर्तमान नयी सभ्यता से शुरू हो रहा था !चातुर्वर्णं मया सृष्टम् भी पुरानी धर्म कर्म अनुशासन व्यवस्था का प्रमाण है लेकिन वर्तमान में जो प्रदूषित हो गया और मनुवादी व्...

जय भारतवर्ष

 शर्यणावति सोममिन्द्रः पिबतु वर्त्रहा | बलं दधान आत्मनि करिष्यन वीर्यं महदिन्द्रायेन्दो परि सरव || आ पवस्व दिशां पत आर्जीकात सोम मीढ्वः | रतवाकेन सत्येन शरद्धया तपसा सुत इन्द्रायेन्दो परि सरव || पर्जन्यव्र्द्धं महिषं तं सूर्यस्य दुहिताभरत | तं गन्धर्वाः परत्यग्र्भ्णन तं सोमे रसमादधुरिन्द्रायेन्दोपरि सरव || रतं वदन्न्र्तद्युम्न सत्यं वदन सत्यकर्मन | शरद्धां वदन सोम राजन धात्रा सोम परिष्क्र्त इन्द्रायेन्दो परि सरव || सत्यमुग्रस्य बर्हतः सं सरवन्ति संस्रवाः | सं यन्ति रसिनो रसाः पुनानो बरह्मणा हर इन्द्रायेन्दो परि सरव || यत्र बरह्मा पवमान छन्दस्यां वाचं वदन | गराव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि सरव || यत्र जयोतिरजस्रं यस्मिन लोके सवर्हितम | तस्मिन मां धेहि पवमानाम्र्ते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि सरव || यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः | यत्रामूर्यह्वतीरापस्तत्र मामम्र्तं कर्धीन्द्रायेन्दो परि सरव || यत्रानुकामं चरणं तरिनाके तरिदिवे दिवः | लोका यत्र जयोतिष्मन्तस्तत्र मामम्र्तं कर्धीन्द्रायेन्दो परि सरव || यत्र कामा निकामाश्च यत्र बरध्नस्य विष्टपम | सवधा च यत्र...

भगवान बुद्ध

 सतयुग के बाद भगवान राम जब त्रेता में थे उसी समय भगवान कृष्ण के अवतार का जिक्र रामचरितमानस में है ,जब यदुवंश कृष्ण अवतारा : भगवान कृष्ण ने द्वापर में ही विष्णु के 24 अवतारों में भगवान बुद्ध के अवतार को गीता के 2/42 में बता दिया था ,बुदधौ शरणं अन्विच्छ जिसका अर्थ है बुद्धं शरणं गच्छामि : हिन्दुओं के लिए आज यही ज्ञान मार्ग है !

हिन्दुत्व

 आर्यों ने सिन्धु नदी के आसपास अपना निवास बनाया और यहां के मूल निवासियों को सिन्धुवासी या हिन्दुवासी ( ऋग्वेद 9/64/10 ) संबोधित किया! ऋषियों से सम्पर्क करके तीन वेदों की रचना की तथा यहां के सामान्य जनजीवन को पंच जनों में विभाजित किया,अधिकांशत: सामान्य तथा पणि नाम से तथा धनाध्य लोगों को द्रविण ( ऋग्वेद 3/108/10) कहा , आचरण से सीधे लोगों को काले और दास कहकर पुकारा तथा सशक्त लोगों से मिलकर युद्ध किए चूंकि ऋषियों से देवताओं का ज्ञान प्राप्त किया था इसीलिए इंद्र आदि से कार्य किया जाना बताकर धार्मिक भय पैदा किया! एक तरफ शाकाहारी मुनि थे ही किन्तु  दूसरी तरफ मांसाहारी राक्षस ( ऋग्वेद 19/87/10)भी थे जो भगवान राम तथा भगवान कृष्ण द्वारा मारे गये थे किन्तु कुछ चतुर लोगों द्वारा यह सब न बताकर धार्मिक एवं जातीय भेदभाव मनुस्मृति जैसे ग्रंथों से फैलाया गया ! कुछ विद्वानों ने हटकर उपनिषद एवं अन्य शास्त्रों का लेखन किया किन्तु वास्तविक ज्ञान ऋषि बाल्मीकि एवं ऋषि व्यास द्वारा रामायण तथा महाभारत में दिया गया

भग्वद्गीता

 आर्य जिस परिमार्जित ज्ञान प्राप्ति के लिए भारत आए वह निर्वेदं ( गीता 2/52 ) और खासतौर से मनुष्यों के लिए ( गीता 2/62 ) बिषयासक्त समुदाय को आसक्ति से दूर करने का है जो प्रज्ञाअपराध का मूल कारण है ॥ भीष्म द्रोण कर्ण सभी स्थितप्रज्ञ होने के बाद भी मौत के मुंह में समा गए क्योंकि महज ज्ञान ही ईश्वर प्राप्ति का साधन नहीं है ॥ श्रद्धा को उसका आधार नहीं माना जा सकता क्योंकि वह गुणों ( गीता 2/17 ) के अधीन है और त्रैगुण्यविषया वेदा के कारण मात्र समर्पण ही एक साधन ( गीता 17/7 ) रह जाता है जो ज्ञानियों का ज्ञान और अज्ञानियों का अन्तिम भाव है जोकि भागवत में स्नान करती युवतियों द्वारा व्यासजी को प्राप्त हुआ ॥

शिवलिंग और नंदी

 सृजन , पालन , संहार सबको संवारिती शक्ति का नाम है पृश्नि ॥ भगवान रुद्र जो साक्षात मृत्यु का भयानक स्वरूप हैं ,वही हैं जिनकी पूजा अर्चना को सभी आतुर रहते हैं ॥ उनका चाहिए कल्याणकारी शिवरूप जिसे हम चिन्ह या लिंगस्वरूप पूज सकते हैं ,प्रार्थना कर सकते हैं (यजुर्वेद 67/3 )  हजारों सालों से यही चल रहा है ,तो उनको साधारण नहीं , धर्मस्वरूप पूजा का अधिकार मानकर ऋषभ यानि नंदीबृषभ( चत्वारि श्रंगः ) जो हमेशा भगवान को आते हुए दक्षिण दिशा में मुख करके देखते हैं , हम साक्षी मानते हैं , कान में प्रार्थना सुनाते हैं , जलाभिषेक शिवलिंग का करते हैं ॥  इनका कल्याणकारी एक रूप बृषाकपि भी है जो बृषश्रंग ऋषि के पुत्र और इंद्र के भाई हैं आर्यों ने भारतीयों के साथ सिंधु नदी के आसपास अपना डेरा बनाया तथा समस्त ग्रुप कहलाया सिंधु या हिन्दू तथा धर्म हुआ सनातन ॥ चूंकि भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतार लेते हैं अतः इंद्र के छोटे भाई वामन भी कहलाए जिन्होंने तीन चरण में भूःभुवःस्वः तीनों लोक का भ्रमण किया ॥

33 देवता

  पृथ्वी आकाश और अन्तरिक्ष में 11 -11 क्रमशः देवता इस प्रकार हैं सोमदेव अर्थात पीले रंग वाले चन्द्र अग्निदेव तेजस्वी  त्वष्टादेव हाथ में कुल्हाड़ी  इंद्र हाथ में बज्र रुद्रदेव हाथ में त्रिशूल पूषादेव दिशाओं में निगरानी विष्णुदेव तीन चरण में तीनों लोक अश्विनीकुमार द्वय साथ में सूर्या पत्नी मित्रदेव वरुणदेव और सूर्यदेव इस प्रकार भूः में तदानुसार भुवः में एवं स्वः में कुल 33 देवता विचरण करते हैं ॥